வெள்ளி, மார்ச் 15, 2013

हे  देवनाथ! आनंदप्रद,दुःख-हरण ;
योग आदि विनोद भक्तों से करनेवाले,
मुरुगा !{कार्तिक)मुझे एक ऐसा उपाय और मार्ग बता।
जिससे मैं " मैं"  भूल सकूं।।जीवन मुक्ति  पा सकूँ।।

kandar anubhooti -arunagirinathar

कंदर अनुभूति 

शरागत रक्षक कृपा वर्षक  षणमुख  पर
 
 सुचारू  शब्दों में गीतांजलि गायेंगे।।

पत्थर-सा दिल भी पसीजने के वे  गीत ,

सुन्दर श्रेष्ठ  बनने ,पंचकर  गणेशजी 

के पद पर सर नवायेंगे।।

ग्रन्थ 
समर में कयमासुर के वीर वधिक!,विनायक सहोदर!
कामना और सेवा  हमारी  एक ही रहे,
जो नृत्य मयूर,अस्त्र शूल, व बांग के मुर्गा ,
 जो  सृजन हैं तेरे ,  उनकी  कीर्ति  करते रहें।।